कॉलेज के संस्थापक प्रो. अर्जुन प्रसाद का संक्षिप्त परिचय

प्रो. अर्जुन प्रसाद का जन्म नवादा जिला के नारदीगंज प्रखंड स्थित बरियो ग्राम के मध्यम वर्गीय किसान परिवार में हुआ था। पिता स्वन्त्रता सेनानी और बड़े भाई कांग्रेस पार्टी के नेता थे। पिता जी धर्म निरपेक्ष , समाजसेवी एवम शिक्षक प्रेमी व्यक्ति थे परन्तु बड़े भाई सर्वगुण संपन्न एवम सर्व अवगुण संपन्न सामंतवादी प्रवृति के व्यक्ति थे। इलाके में उनकी तूती बोलती थी। घर के मालिक वही थे। उनके सामंती आचरण का विरोध करने के कारन प्रो. प्रसाद जो पटना यूनिवर्सिटी के छात्र थे , को इंटर पास करने के बाद पढाई का खर्च बंद कर दिए गया। आगे की पढाई प्रो. प्रसाद ने भीख मांगकर तथा ट्यूशन कर पूरी की। तिलकामांझी भागलपुर यूनिवर्सिटी का शिक्षक होने के कारन उनकी सामाजिक एवम राजनितिक गतिविधियों का कार्य -क्षेत्र खासकर भागलपुर प्रमंडल रहा। वे सुल्तानगंज के सी पी एम के प्रभारी भी थे। इस कारन इस क्षेत्र की आम जनता एवम नेता से उनका गहरा लगाव रहा हैं।

स्थानीय जनता की आकांक्षा एवम क्षेत्र की जरुरत को देखते हुए प्रो. अर्जुन प्रसाद जो सी. पी. आई. एम के बिहार पार्टी के राज्य सचिव मंडल के सदस्य , भारत की जनवादी नौजवान सभा के बिहार राज्य कमिटी के अध्यक्ष तथा राष्ट्रीय कमिटी के सदस्य हुआ करते थे , की प्रेरणा से ए के गोपालन कॉलेज की स्थापना की गयी। प्रो. प्रसाद आपातकाल में जेल जा चुके थे। का. गोपालन का विरोध करने के क्रम में पुलिस लाठी चार्ज में घायल हुए थे। घायल होने के कुछ दिनों के बाद अस्पताल में उनकी मौत हो गयी थी। प्रो. प्रसाद गोपालन के देशभक्ति एवम ईमानदारी से बहुत प्रभावित थे। इस कारण दोनों के बिच आत्मीय सम्बन्ध कायम हो गया था। अतएव प्रो. प्रसाद के सुझाव एवम प्रेरणा से कॉलेज का नाम ए के गोपालन कॉलेज रखा गया।

प्रो. प्रसाद को इस कॉलेज के विकास एवम रक्षा के लिए महंगी कीमत चुकानी पड़ी उन्होंने न केवल कॉलेज को धन दिया, बल्कि उन्हें इसी कॉलेज के कारण पार्टी से निष्कासित होना पड़ा। पार्टी के राज्य सचिव का गणेश शंकर विद्यार्थी ने उन्हें कॉलेज का कोष एवम कागजात पार्टी के राज्य सचिव के ही एक सदस्य को सौपने की आज्ञा दी थी। जिसका पालन वे नहीं कर सकते थे क्योंकि कॉलेज का कोष बैंक में रहता हैं, जिसका संचालन सचिव एवम प्रधानाचार्य के संयुक्त हस्ताक्षर से होता हैं तथा कॉलेज के दस्तावेज का कस्टडियन प्रधानाचार्य होता हैं। ऐसी स्थिति में वे पार्टी के उक्त आदेश का पालन करने में असमर्थ थे। इसी को पार्टी ने अनुशासनहीनता करार दिया और इसी कारण उन्हें पार्टी से निष्काषित कर दिया गया जबकि उन्होंने पार्टी के निर्देशानुसार कॉलेज के सचिव के पद से इस्तीफा दे दिया था जबकि प्रबंध समिति के अध्यक्ष एवं सदस्य पार्टी के ही सदस्य थे , जिनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गयी।

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